# जशपुर कलेक्टर का युगांतकारी निर्णय: 70 साल बाद पहाड़ी कोरवाओं को मिलेगी उनकी ‘माटी’, छल से कब्जाई 31 एकड़ जमीन वापसी का आदेश

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# जशपुर कलेक्टर का युगांतकारी निर्णय: 70 साल बाद पहाड़ी कोरवाओं को मिलेगी उनकी ‘माटी’, छल से कब्जाई 31 एकड़ जमीन वापसी का आदेश AI GENERATED जशपुर . आदिवासियों के जल, जंगल और जमीन के अधिकारों को लेकर जशपुर के कलेक्टर न्यायालय ने एक ऐसा फैसला सुनाया है, जो पूरे प्रदेश के लिए ‘नजीर’ बन गया है। कलेक्टर रोहित व्यास ने एक ऐतिहासिक आदेश जारी करते हुए, वर्ष 1955 में छल-कपट के जरिए कब्जाई गई **पहाड़ी कोरवा** (राष्ट्रपति के दत्तक पुत्र मानी जाने वाली विशेष पिछड़ी जनजाति) की **31.31 एकड़** भूमि के हस्तांतरण को ‘शून्य’ घोषित कर दिया है। यह फैसला इस मायने में क्रांतिकारी है कि इसने दशकों पुराने उस भ्रम को तोड़ दिया है कि ‘आदिवासी से आदिवासी’ के बीच हुए पुराने जमीन सौदों को चुनौती नहीं दी जा सकती। अधिवक्ता सत्यप्रकाश तिवारी अति पिछड़ी जनजाति (पहाड़ी कोरवा) के पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं। कलेक्टर न्यायालय में उनकी पैनी और तथ्यपरक पैरवी के कारण ही 70 साल पुराने इस पेचीदा मामले में न्याय की जीत संभव हो सकी। उन्होंने न्यायालय के समक्ष मजबूती से पक्ष रखा कि किस प्रकार भोली-भाली जनजाति के लोगों को कानूनी दांव-पेच और धर्मांतरित व्यक्तियों द्वारा छल का शिकार बनाकर उनकी पैतृक संपत्ति हड़पी गई थी। ### **क्यों ऐतिहासिक है यह फैसला? (प्रमुख बिंदु)** न्यायालय ने सूक्ष्म कानूनी बारीकियों और दस्तावेजों का अध्ययन कर निम्नलिखित निष्कर्ष निकाले:  * **धारा 170(ख) का कवच:** न्यायालय ने स्पष्ट किया कि छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता की धारा 170(ख) का दायरा अत्यंत व्यापक है। इसमें ‘प्रत्येक व्यक्ति’ शब्द शामिल है, जिसका अर्थ है कि यदि खरीदार आदिवासी भी है, लेकिन उसने छल या नियमों का उल्लंघन कर जमीन ली है, तो उसे संरक्षण नहीं मिलेगा।  * **1959 के पूर्व के नियमों का उल्लंघन:** कलेक्टर ने पाया कि 1959 की संहिता से पहले भी **मध्य प्रदेश भू-राजस्व संहिता 1954** प्रभावी थी। उस समय भी जमीन हस्तांतरण की सूचना सक्षम अधिकारी को देना अनिवार्य था, जिसका पालन नहीं किया गया।  * **अवैध बैनामा:** तत्कालीन कलेक्टर या अधिकृत अधिकारी की अनिवार्य अनुमति के बिना किया गया विक्रय पत्र (रजिस्ट्री) कानूनी रूप से ‘अकृत एवं शून्य’ है।  * **कब्जा बनाम कागज:** न्यायालय ने स्वीकार किया कि भले ही कागजों में नाम हेरफेर से बदला गया, लेकिन जमीन पर आज भी भौतिक कब्जा पीड़ित पहाड़ी कोरवाओं का ही है। ### ** भूमि सुरक्षा पर बड़ा फैसला** अधिवक्ता सत्यप्रकाश तिवारी ने फैसले के बाद मीडिया को बताया कि: “यह आदेश उन लोगों के लिए एक सख्त चेतावनी है जो धर्मांतरण की आड़ में या आदिवासी पहचान का लाभ उठाकर विशेष पिछड़ी जनजातियों की जमीनों को कपटपूर्ण तरीके से हड़प रहे हैं। जशपुर कलेक्टर का यह फैसला उन हजारों आदिवासियों के लिए उम्मीद की किरण है जिनकी जमीनें दशकों पहले नियमों को ताक पर रखकर छीनी गई थीं।” ### **अंतिम आदेश: राजस्व रिकॉर्ड में सुधार के निर्देश** कलेक्टर जशपुर ने अनुविभागीय अधिकारी (SDO) के पूर्व आदेश को निरस्त कर दिया है। उन्होंने राजस्व विभाग को सख्त निर्देश दिए हैं कि ग्राम करदनापाठ की विवादित 31.31 एकड़ भूमि को तत्काल मूल भू-स्वामी के विधिक वारिसों (भन्जू एवं अन्य) के नाम पर दर्ज (Mutation) कर रिकॉर्ड अपडेट किया जाए। छत्तीसगढ़ के इतिहास में यह फैसला विशेष पिछड़ी जनजातियों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा हेतु एक मील का पत्थर साबित होगा। यह जीत केवल भन्जू और उनके परिवार की नहीं, बल्कि उन सभी आदिम जनजातियों की है जो अपनी जमीन और पहचान बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

जशपुर में कृषि क्रांति 2.0: विधायक गोमती साय ने किया तीन दिवसीय भव्य मेले का आगाज़, देश भर की कंपनियों की नजर जशपुर के काजू और जीरा फूल चावल पर

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जशपुर में कृषि क्रांति 2.0: विधायक गोमती साय ने किया तीन दिवसीय भव्य मेले का आगाज़, देश भर की कंपनियों की नजर जशपुर के काजू और जीरा फूल चावल पर कुनकुरी (जशपुर) | 23 मार्च 2026 खास बातें (Highlights): उद्घाटन: पत्थलगांव विधायक गोमती साय ने फीता काटकर मेले की शुरुआत की। आयोजन: कुनकुरी कृषि महाविद्यालय में तीन दिवसीय ‘कृषि क्रांति एक्सपो 2.0’। बड़ी डील: जीरा फूल चावल, काजू, टाऊ और आम की खरीदी के लिए कंपनियों ने दिखाया भारी उत्साह। मकसद: किसानों और बड़ी कंपनियों के बीच सीधा व्यापारिक संवाद (Buyer-Seller Meet)। जशपुर – छत्तीसगढ़ के जशपुर जिले में खेती-किसानी को लाभ का धंधा बनाने की दिशा में एक बड़ी पहल हुई है। कुनकुरी स्थित कृषि महाविद्यालय के प्रांगण में तीन दिवसीय ‘कृषि क्रांति एक्सपो 2.0’ का शानदार आगाज हुआ। इस भव्य मेले का उद्घाटन मुख्य अतिथि पत्थलगांव विधायक श्रीमती गोमती साय ने किया। इस अवसर पर उन्होंने किसानों को संबोधित करते हुए कहा कि जशपुर की माटी में पैदा होने वाली फसलों की खुशबू अब सात समंदर पार तक जाएगी। कंपनियों और किसानों का सीधा संवाद इस एक्सपो की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यहाँ देश भर की नामी कृषि आधारित कंपनियां सीधे किसानों से रूबरू हो रही हैं। जिला प्रशासन की इस पहल का स्वागत करते हुए किसानों ने बताया कि अब उन्हें अपनी फसल बेचने के लिए बिचौलियों पर निर्भर नहीं रहना होगा। वे अपनी उपज की गुणवत्ता और मार्केटिंग को लेकर सीधे कंपनियों से चर्चा कर रहे हैं। कलेक्टर रोहित व्यास की ‘ब्रांड जशपुर’ रणनीति कलेक्टर रोहित व्यास ने जानकारी दी कि यह ‘कृषि क्रांति एक्सपो’ का दूसरा वर्ष है। उन्होंने कहा— “जशपुर जिले में पैदा होने वाली फसलों और फलों के प्रोडक्ट्स की मांग अब देशभर में होने लगी है। यह एक ऐसा मंच है जहाँ क्रेता और विक्रेता के बीच सीधा संवाद हो रहा है, जिससे किसानों को उनकी उपज का सही दाम मिल सके।” इन उत्पादों की मची है धूम मेले के मीटिंग हॉल में जशपुर के खास उत्पादों को लेकर कंपनियों के बीच जबरदस्त उत्साह देखा जा रहा है। विशेष रूप से निम्नलिखित उत्पादों की ट्रेडिंग और मार्केटिंग पर सत्र चल रहे हैं: जीरा फूल सुगंधित चावल: अपनी खुशबू के लिए मशहूर। काजू और टाऊ: जशपुर की पहचान बन चुके ये उत्पाद। रामतिल और मूंगफली: व्यापारिक संभावनाओं से भरपूर। दशहरी और आम्रपाली आम: सीजन से पहले ही कंपनियों ने खरीदी में दिलचस्पी दिखाई है। एक्सपर्ट्स दे रहे हैं ट्रेनिंग तीन दिनों तक चलने वाले इस मेले में केवल प्रदर्शनी ही नहीं, बल्कि विभिन्न तकनीकी सत्र भी आयोजित किए जा रहे हैं। कृषि वैज्ञानिकों द्वारा किसानों को आधुनिक खेती, फसलों की प्रोसेसिंग और ब्रांडिंग के गुर सिखाए जा रहे हैं।

भारत की LPG सुरक्षा: वैश्विक संकट के बीच भी घरेलू गैस सप्लाई जारी

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भारत की LPG सुरक्षा: वैश्विक संकट के बीच भी घरेलू गैस सप्लाई जारी निर्मल कुमार मार्च 2026 में पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के कारण होर्मुज जलडमरूमध्य से होने वाली आपूर्ति प्रभावित हुई, जो भारत के लगभग 90% LPG आयात का मुख्य मार्ग है। भारत अपनी जरूरत का करीब 60% LPG आयात करता है, इसलिए कमी की आशंका बनी थी। लेकिन सरकार ने समय पर कदम उठाते हुए यह सुनिश्चित किया कि देश में कहीं भी घरेलू गैस की कमी न हो। पूरे देश में LPG की सप्लाई सामान्य रही, डिलीवरी समय भी पहले जैसा ही बना रहा। 33 करोड़ से ज्यादा परिवार, जिनमें उज्ज्वला योजना के लाभार्थी भी शामिल हैं, बिना किसी रुकावट गैस प्राप्त करते रहे। घरेलू उत्पादन बढ़ाकर स्थिति संभाली सरकार ने रिफाइनरियों और पेट्रोकेमिकल प्लांट्स को निर्देश दिया कि LPG उत्पादन बढ़ाया जाए। इसके तहत: पेट्रोकेमिकल्स में उपयोग होने वाली गैस को LPG में बदला गया IOC, BPCL और HPCL को प्राथमिकता दी गई उत्पादन में 25–28% तक बढ़ोतरी हुई रिलायंस जैसी निजी कंपनियों ने भी उत्पादन बढ़ाने में सहयोग किया। घरों को दी गई प्राथमिकता सरकार ने स्पष्ट किया कि सबसे पहले घरेलू उपभोक्ताओं को गैस मिलेगी: रिफाइनरी का पूरा अतिरिक्त उत्पादन घरों के लिए दिया गया अस्पताल और स्कूलों को भी प्राथमिकता मिली होटल और रेस्टोरेंट के लिए अलग व्यवस्था बनाई गई गैर-घरेलू LPG की सप्लाई जारी रही, लेकिन नियंत्रण के साथ। घबराहट में बुकिंग रोकने के उपाय सरकार ने देखा कि असली कमी नहीं, बल्कि घबराहट में ज्यादा बुकिंग हो रही है। इसे रोकने के लिए: शहरों में गैस रिफिल के बीच कम से कम 25 दिन का अंतर गांवों में यह सीमा 45 दिन OTP आधारित डिलीवरी सिस्टम (DAC) लागू ऑनलाइन बुकिंग (SMS, WhatsApp, ऐप) को बढ़ावा अब बुकिंग सामान्य होने लगी है। वैकल्पिक ईंधन का इस्तेमाल LPG पर दबाव कम करने के लिए: 48,000 KL केरोसिन अतिरिक्त उपलब्ध कराया गया होटल-रेस्टोरेंट में बायोमास, कोयला आदि की अस्थायी अनुमति उद्योगों के लिए फ्यूल ऑयल उपलब्ध कराया गया PNG (पाइप गैस) को बढ़ावा सरकार ने PNG उपयोग को बढ़ाने के लिए: PNG वाले नए LPG कनेक्शन पर रोक शहरों में PNG अपनाने के लिए प्रोत्साहन आयात और सप्लाई पर निगरानी 80,000 टन LPG के नए शिपमेंट रास्ते में अमेरिका, कनाडा, नॉर्वे जैसे देशों से सप्लाई बढ़ाने की कोशिश सभी राज्यों में निगरानी और छापेमारी कहीं भी गैस की कमी की रिपोर्ट नहीं। सरकार ने अपील की है: जरूरत होने पर ही गैस बुक करें डिजिटल माध्यम अपनाएं अफवाहों पर ध्यान न दें। (लेखक समसामयिक घटनाओं के जानकार हैं।यह उनके निजी विचार हैं।)

जशपुर: कुनकुरी में जैन मुनिश्री प्रमाण सागर का भव्य मंगल प्रवेश, मीडिया को दी नसीहत— “युद्ध की चर्चा छोड़, शांति का पुरुषार्थ करें”

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जशपुर: कुनकुरी में जैन मुनिश्री प्रमाण सागर का भव्य मंगल प्रवेश, मीडिया को दी नसीहत— “युद्ध की चर्चा छोड़, शांति का पुरुषार्थ करें” जशपुर (कुनकुरी) | छत्तीसगढ़ के राजकीय अतिथि, प्रख्यात जैन संत मुनिश्री प्रमाण सागर महाराज का जशपुर जिले के कुनकुरी शहर में गौरवशाली शुभागमन हुआ। मध्यप्रदेश के भोपाल से पावन तीर्थ सम्मेद शिखर जी के विहार पर निकले मुनिश्री का स्थानीय जैन समाज सहित सर्व समाज ने गाजे-बाजे और पुष्पवर्षा के साथ भव्य स्वागत किया। मुनिश्री के आगमन से पूरे जशपुर वनवासी अंचल में एक सुंदर आध्यात्मिक वातावरण निर्मित हो गया है। मीडिया से संवाद: “युद्ध की चर्चा से हमें क्या मिलेगा?” कुनकुरी प्रवास के दौरान मुनिश्री प्रमाण सागर महाराज ने मीडिया से विशेष चर्चा की। विश्व में जारी संघर्षों और नकारात्मकता पर उन्होंने कड़ा संदेश देते हुए कहा: “हम विहारी हैं और विहार कर रहे हैं। छत्तीसगढ़ के जो संस्कार हैं, जो यहां के लोग प्रेम देते हैं, अच्छे हैं। मेरा संदेश कहेंगे तो मैं यही कहूंगा कि सभी लोग अपने जीवन को सकारात्मक और रचनात्मक कार्यों में लगाएं। समस्याओं की तरफ देखने की जगह समाधान के रास्ते में कितनी तकनीकी का उपयोग करें पर तकनीकी के आदी ना बनें।” मुनिश्री ने मीडिया की भूमिका पर जोर देते हुए आगे कहा: “मीडिया के माध्यम से इस समय मैं यही कहना चाहूंगा कि युद्ध और संघर्ष की चर्चा करने की जगह शांति की प्रार्थना करें। दिनभर युद्ध की रिपोर्ट प्रसारित कर रहे हैं क्यों ना वैश्विक स्तर पर एक साथ लोगों को शांति की प्रार्थना में लगाएं, जिससे लोगों को सद्बुद्धि आए। युद्ध की चर्चा करने से हमें क्या मिलेगा? हम सकारात्मक भाव तरंग सर्वत्र उत्पन्न करें जो लोग, जो शक्तियां युद्ध के लिए उन्मादी बनी हुई हैं, उनकी बुद्धि नियंत्रित हो तो अच्छा होगा। एक सकारात्मक प्रयास हो सारे विश्व में ही युद्ध की ही चर्चा है हम न युद्ध की चर्चा करें ना युद्ध की चिंता करें। शांति का पुरुषार्थ करें।” श्रद्धालुओं का उमड़ा सैलाब, अब जशपुर की ओर विहार मुनिश्री के प्रवचन कार्यक्रम और शंका समाधान सत्र में भारी संख्या में श्रद्धालु उमड़ रहे हैं। मुख्यमंत्री की धर्मपत्नी श्रीमती कौशल्या साय, कुनकुरी नगरपंचायत अध्यक्ष विनयशील ने भी अपनी शंकाओं का समाधान पाया।कुनकुरी के स्थानीय निवासियों के साथ-साथ दूर-दराज से आए लोग भी मुनिश्री का आशीर्वाद प्राप्त कर रहे हैं। कुनकुरी युवा संघ के रवि जैन ने बताया कि मुनिश्री का प्रवास कुनकुरी के लिए सौभाग्य की बात है। उन्होंने मुनिश्री के निरंतर विहार पर प्रकाश डालते हुए कहा: “बहते पानी को कोई रोक नहीं सकता। मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज का अब कुनकुरी शहर में विहार के बाद जशपुर की ओर विहार होगा, जिसकी तैयारियां शुरू हो चुकी हैं।” कुनकुरी में धर्म की प्रभावना करने के बाद, मुनिश्री अब सम्मेद शिखर की अपनी यात्रा को जारी रखते हुए जशपुर की ओर प्रस्थान करेंगे। पूरा क्षेत्र उनके दर्शन और वंदन के लिए उत्साहित है।

रुसा प्रशिक्षण कार्यक्रम के दूसरे दिन मिली कंप्यूटेशनल नैनोमटेरियल्स और उन्नत अनुसंधान तकनीकों की जानकारीः डॉ. तपेश चंद्र गुप्ता

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रुसा प्रशिक्षण कार्यक्रम के दूसरे दिन मिली कंप्यूटेशनल नैनोमटेरियल्स और उन्नत अनुसंधान तकनीकों की जानकारीः डॉ. तपेश चंद्र गुप्ता रायपुर, 11 मार्च, 2026 – रायपुर संभाग के विज्ञान शोध छात्रों के लिए आयोजित तीन दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम का दूसरा दिन आज शासकीय जे. योगानंदम छत्तीसगढ़ महाविद्यालय, रायपुर में सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। यह कार्यक्रम रुसा-2.0 के अंतर्गत आयोजित किया गया है। इस अवसर पर आयोजित कार्यक्रम के बारे में संयोजक समिति के सदस्य डॉ. गोवर्धन व्यास ने बताया कि दूसरे दिन शोध छात्रों को ’’कंप्यूटेशनल नैनोमटेरियल्स और उन्नत अनुसंधान तकनीकों’’ में नए दृष्टिकोण और व्यावहारिक मार्गदर्शन प्रदान किया गया। दिन का पहला तकनीकी सत्र ’’डॉ. बी. केशव राव, श्री शंकराचार्य तकनीकी परिसर, भिलाई’’ द्वारा संचालित किया गया। इस सत्र में उन्होंने ’’ग्राफीन में रेखीय दोषों का महत्व और नैनो-सेंसर प्रदर्शन पर उनका प्रभाव’’ समझाया। उन्होंने बताया कि कैसे ’’ग्रेन सीमाएँ और विस्तारित विस्थापन’’ विद्युत चालकता, पदार्थ की अवशोषण क्षमता और यांत्रिक स्थिरता को प्रभावित करते हैं। प्रतिभागियों को यह स्पष्ट रूप से समझ में आया कि संरचनात्मक दोषों का सही तरीके से उपयोग करके नैनो-सेंसर के प्रदर्शन को बेहतर बनाया जा सकता है। दिन का दूसरा तकनीकी सत्र भी ’’डॉ. बी. केशव राव’’ द्वारा संचालित किया गया, जिसमें उन्होंने ’’दोष प्रबंधन में व्यावहारिक रणनीतियों’’ पर प्रकाश डाला ताकि ग्राफीन आधारित सेंसर की संवेदनशीलता बढ़ाई जा सके। इस सत्र में प्रतिभागियों ने सक्रिय रूप से भाग लिया और ’’सिंथेसिस और सिमुलेशन तकनीकों के वास्तविक अनुसंधान परियोजनाओं में उपयोग’’ के बारे में प्रश्न पूछे। तकनीकी सत्रों के बाद ’’व्यावहारिक प्रशिक्षण सत्र’’ आयोजित किया गया। इसमें संकाय सदस्य और शोध छात्र ’’लिनक्स वातावरण’’ में कार्य करते हुए ’’सांद्रता आधारित सैद्धांतिक विश्लेषण’’ और मॉडलिंग अभ्यास कर रहे थे। डॉ. राव ने दिखाया कि कैसे ’’2डी सामग्री की ज्यामितीय संरचना को परिभाषित किया जाता है, लैटिस मानों को अनुकूलित किया जाता है’’, और ’’सांद्रता और आंशिक सांद्रता डेटा तैयार किए जाते हैं।’’ प्रतिभागियों ने ’’ग्राफ तैयार करना और उनका विश्लेषण करना’’ सीखा, जिससे उन्हें नैनोमटेरियल अनुसंधान में व्यावहारिक अनुभव प्राप्त हुआ। संयोजक समिति के सदस्य डॉ. लखपति पटेल ने कार्यक्रम और उद्देश्यों की रूपरेखा प्रस्तुत की, ताकि प्रतिभागियों को तकनीकी सत्रों और हैंड्स-ऑन अभ्यास में प्रभावी मार्गदर्शन मिल सके। कार्यक्रम का समन्वय ’’डॉ. अनिल रामटेक’’ ने किया, और धन्यवाद ज्ञापन ’’डॉ. नीरजा सेन’’ ने दिया। डॉ. मंजु वर्मा, आईक्यूएसी संयोजक, ने बताया कि ऐसे कार्यक्रम महाविद्यालय के समग्र विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, विशेषकर ’’नैक ग्रेडिंग’’ के संदर्भ में, और ये पहल शोध को और प्रोत्साहित करेंगी। अन्य समिति सदस्य डॉ. नियति गुरुद्वान और डॉ. वैषाली शारदे ने कार्यक्रम को समर्थन देने में सक्रिय भूमिका निभाई। उपस्थित संकाय सदस्यों में डॉ. भुवनेश्वरी वर्मा, डॉ. नम्रता दुबे, डॉ. अंजलि चंद्रवंशी आदि शामिल थे। इस प्रकार, कार्यक्रम के दूसरे दिन ने ’’सैद्धांतिक ज्ञान को व्यावहारिक प्रशिक्षण के साथ जोड़कर’’ प्रतिभागियों को ’’डिफेक्ट इंजीनियरिंग, सिमुलेशन रणनीतियों और नैनोमटेरियल नवाचारों’’ की समझ को और गहरा किया। दिन के सत्रों के समापन पर डॉ. तपेश चंद्र गुप्ता, प्राचार्य एवं क्षेत्रीय अपर संचालक, रायपुर, ने शोध छात्रों और संकाय सदस्यों की सक्रिय भागीदारी की सराहना की। उन्होंने ’’आधुनिक कंप्यूटेशनल उपकरणों को सुसंगत वैज्ञानिक अनुसंधान के साथ जोड़ने’’ के महत्व को रेखांकित किया और प्रतिभागियों को प्रशिक्षण के दौरान अर्जित ज्ञान का उपयोग ’’शैक्षणिक और सामाजिक रूप से प्रासंगिक नवाचारों को बढ़ावा देने’’ के लिए करने के लिए प्रेरित किया।

*प्रेम और सद्भाव के रंगों से सराबोर हो होली : मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने प्रदेशवासियों को दी होली की बधाई ,शुभकामनाएँ

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*प्रेम और सद्भाव के रंगों से सराबोर हो होली : मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने प्रदेशवासियों को दी होली की बधाई ,शुभकामनाएँ* रायपुर 3 मार्च 2026/मुख्यमंत्री  विष्णु देव साय ने रंगों के पावन पर्व होली के अवसर पर प्रदेशवासियों को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ दी हैं। उन्होंने कामना की है कि यह उल्लास, उमंग और आत्मीयता का महापर्व सभी के जीवन में सुख, शांति, समृद्धि और नई ऊर्जा का संचार करे। मुख्यमंत्री श्री साय ने कहा कि होली केवल रंगों का उत्सव नहीं, बल्कि यह आपसी प्रेम, सौहार्द और भाईचारे को सशक्त बनाने का अवसर है। यह पर्व समाज में समरसता, सद्भाव और एकता की भावना को प्रगाढ़ करता है तथा हमें सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति में होली का विशेष महत्व है। यह पर्व बुराई पर अच्छाई की विजय, अहंकार पर विनम्रता की जीत और वैमनस्य पर प्रेम की प्रधानता का संदेश देता है। होली के रंग हमें स्मरण कराते हैं कि विविधताओं से परिपूर्ण हमारे समाज की वास्तविक शक्ति परस्पर विश्वास, अपनत्व और सामूहिक सहयोग में निहित है। मुख्यमंत्री श्री साय ने प्रदेशवासियों से अपील की कि वे इस पर्व को हर्षोल्लास, संयम और पारंपरिक मर्यादाओं के साथ मनाएँ। प्राकृतिक रंगों का उपयोग कर पर्यावरण संरक्षण का संदेश दें तथा समाज के वंचित एवं जरूरतमंद वर्गों के साथ भी इस उत्सव की खुशियाँ साझा करें। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि प्रेम, सद्भाव और भाईचारे के रंगों से सजी यह होली छत्तीसगढ़ की एकता, सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक गौरव को और अधिक सुदृढ़ करेगी।

रांची में ‘TCI प्रोड्यूसर्स मीट 2026’ का समापन, आदिवासी सिनेमा को मिलेगा नया मंच

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रांची में ‘TCI प्रोड्यूसर्स मीट 2026’ का समापन, आदिवासी सिनेमा को मिलेगा नया मंच रांची, 1 मार्च 2026 – Tribal Cinema of India (TCI) के द्वारा रांची के बगाइचा सोशल सेंटर में दो दिवसीय ‘TCI प्रोड्यूसर्स मीट 2026’ का आयोजन किया गया। यह कार्यक्रम 28 फरवरी और 1 मार्च को हुआ। इसमें देश के अलग-अलग राज्यों से फिल्म बनाने वाले लोग, निर्देशक, लेखक और डिजिटल प्लेटफॉर्म से जुड़े प्रतिनिधि शामिल हुए। इस बैठक का मुख्य उद्देश्य आदिवासी और क्षेत्रीय फिल्मों को मजबूत बनाना और उन्हें देश-विदेश तक पहुंचाना था। पहले दिन क्या हुआ? पहले दिन चर्चा हुई कि आदिवासी फिल्मों को सिर्फ कला तक सीमित न रखकर इसे रोजगार और उद्योग के रूप में कैसे आगे बढ़ाया जाए। फिल्म बनाने में आने वाली दिक्कतों—जैसे पैसों की कमी, सही मार्गदर्शन का अभाव और फिल्मों को दर्शकों तक पहुंचाने की समस्या—पर खुलकर बात हुई। डिजिटल प्लेटफॉर्म मेरा टीवी की ओर से भी जानकारी दी गई कि अब गांव और क्षेत्रीय भाषा की फिल्में भी ऑनलाइन माध्यम से देश-विदेश में दिखाई जा सकती हैं। दूसरे दिन क्या निर्णय हुए ? दूसरे दिन फिल्म निर्माण को बेहतर बनाने और नई तकनीक अपनाने पर चर्चा हुई। वक्ताओं ने कहा कि क्षेत्रीय फिल्मों को सिर्फ स्थानीय दर्शकों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। अच्छी डबिंग और तकनीक से इन फिल्मों को दूसरी भाषाओं में भी दिखाया जा सकता है। बैठक में ‘प्रोड्यूसर्स कंसोर्टियम’ यानी निर्माताओं का एक समूह बनाने का प्रस्ताव रखा गया। यह समूह फिल्मों के निर्माण और वितरण में आपसी सहयोग करेगा। साथ ही एक कार्यकारी टीम और रिसर्च टीम बनाने की भी बात कही गई। फिल्म पिचिंग सेशन भी हुआ कार्यक्रम के अंतिम चरण में नए फिल्मकारों ने अपने फिल्म प्रोजेक्ट प्रस्तुत किए। इससे उन्हें निवेशकों से जुड़ने और भविष्य में फिल्म बनाने का अवसर मिल सकेगा। कई राज्यों से पहुंचे प्रतिभागी इस कार्यक्रम में झारखंड, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल, ओडिशा और बिहार से करीब 50 फिल्म निर्माता, निर्देशक और कलाकार शामिल हुए। आयोजकों ने कहा कि TCI आगे भी आदिवासी संस्कृति और पहचान को मजबूत करने के लिए काम करता रहेगा। अनामिका मरियन टोप्पो ने ट्राइबल सिनेमा ऑफ इंडिया (TCI) की प्रेस विज्ञप्ति जारी की। कार्यक्रम को सफल बनाने में बीजू टोप्पो, दीपक बड़ा, एनुस कुजूर, जगत लकड़ा, सुरेंद्र कुजूर, अंकित बागची, रामकृष्ण सोरेन, इशाराज मुर्मू, साहेब नागपुरिया, निशिता रॉय, राजीव सिन्हा, मिथिलेश छेत्री, सृष्टि मरांडी, सौरव मुंडा, दीप्ति मिंज, अनामिका टोप्पो, अजित टुडू, संजय शुभम, आकृति लकड़ा, आनंद हेंब्रम, अनिकेत उरांव, आनंद सोरेन, पवनदीप खाखा और राकेश रोशन किड़ो आदि ने सक्रिय योगदान दिया। पूरे कार्यक्रम का कुशल संचालन जेनिफर बाखला द्वारा किया गया।

नहीं रहे पी. के. बजाज, ‘लोटपोट’ को ऊँचाइयों तक पहुंचाने वाले युगपुरुष को भावभीनी श्रद्धांजलि

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नहीं रहे पी. के. बजाज, ‘लोटपोट’ को ऊँचाइयों तक पहुंचाने वाले युगपुरुष को भावभीनी श्रद्धांजलि  नई दिल्ली – हिंदी बाल-पत्रकारिता जगत के लिए अत्यंत दुखद समाचार सामने आया है। लोकप्रिय बाल पत्रिका लोटपोट को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाने वाले वरिष्ठ प्रकाशक पी. के. बजाज का निधन हो गया है। उनके निधन की जानकारी प्रख्यात कार्टूनिस्ट एवं ‘मोटू पतलू’ के सर्जक डॉ. हरविंदर मांकड़ ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट के माध्यम से साझा की। डॉ. मांकड़ ने भावुक शब्दों में लिखा कि आज मन भारी है और शब्द साथ नहीं दे रहे। उन्होंने बताया कि पी. के. बजाज ने अपने पूज्य पिता ए. पी. बजाज के साथ कंधे से कंधा मिलाकर ‘लोटपोट’ और मायापुरी जैसी पत्रिकाओं को देश-दुनिया में विशिष्ट पहचान दिलाई। उनके नेतृत्व में ये पत्रिकाएं पाठकों के बीच सबसे अधिक पढ़ी और सराही जाने वाली पत्रिकाओं में शामिल रहीं। नए रचनाकारों के संरक्षक थे बजाज जी डॉ. मांकड़ के अनुसार, पी. के. बजाज केवल एक प्रकाशक नहीं थे, बल्कि वे प्रतिभाओं को पहचानने वाले साधक थे। नए रचनाकारों को अवसर देना, उनकी प्रतिभा पर विश्वास करना और उन्हें आगे बढ़ाने का साहस देना उनकी कार्यशैली का स्वाभाविक हिस्सा था। उन्होंने बताया कि उनका बजाज जी से 47 वर्षों का आत्मीय संबंध रहा। उनके जीवन की पहली बड़ी पहचान ‘मोटू पतलू’ को प्रकाशित करने का श्रेय भी बजाज जी को ही जाता है। आज यह किरदार घर-घर में मुस्कुराहट बाँट रहा है तो उसमें बजाज जी का विश्वास, आशीर्वाद और दूरदर्शिता शामिल है। संघर्ष में देखा संभावना, अनजान को दी पहचान डॉ. मांकड़ ने अपने संदेश में लिखा कि जब वे संघर्ष के दौर में थे, तब बजाज जी ने उनमें संभावना देखी। जब वे अनजान थे, तब उन्होंने पहचान दी। हर मोड़ पर उन्होंने संबल और हौसला प्रदान किया। उनके निधन से बाल साहित्य, कॉमिक्स और पत्रिका प्रकाशन जगत में शोक की लहर है। ‘लोटपोट’ का हर पन्ना, हर मुस्कुराता चेहरा और हर छपी हुई रेखा मानो उन्हें नमन कर रही है। ईश्वर से प्रार्थना की जा रही है कि दिवंगत आत्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान दें और परिजनों व शुभचिंतकों को इस अपार दुःख को सहन करने की शक्ति प्रदान करें। सेलिब्रिटी क्लब ऑफ इंडिया की ओर से उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि दी गई।

ईब नदी पर चल रहे सोना खदानों से नदी का पानी हुआ लाल,परम्परा का हवाला देकर नदी का जीवन खतरे में डाल रहा मानव समूह,सरकार को इसका पता नहीं!

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मेरे देश की धरती सोना उगले,उगले हीरे मोती,,,हमारे जशपुर जिले में फरसाबहार तहसील क्षेत्र की धरती सोना उगल रही है।जिसकी स्पीड बढ़ाने के लिए स्वर्ण माफिया सक्रिय हो गए हैं।बीते तीन दिनों की हमारी पड़ताल में मानव समूह ईब नदी के लिए खतरा बन चुके हैं हालांकि इस अवैध कारोबार के पीछे के चेहरे तक पहुंचने की हमारी कोशिश नाकाम रही है। जशपुर (फरसाबहार) जशपुर जिले में अवैध रेत खदानों की खबरें आम हैं, लेकिन अब जिले की जीवनदायिनी ईब नदी अवैध सोना खनन की भेंट चढ़ती नजर आ रही है। फरसाबहार तहसील के धौरासांड गांव से होकर बहने वाली ईब नदी पम्पशाला, कोताईबीरा कपाट द्वार और लावाकेरा होते हुए ओडिशा राज्य में प्रवेश करती है। इसी पूरे क्षेत्र में नदी के तटों और आसपास की सरकारी व निजी जमीनों को जेसीबी और ट्रैक्टरों से खोदकर, मिट्टी के ढेर बनाए जा रहे हैं और ओपन टनल सिस्टम के जरिए मिट्टी को सीधे नदी में बहाया जा रहा है। इस प्रक्रिया में सोने के कण बेहद नाममात्र निकल रहे हैं, लेकिन उसके बदले लाखों गुना ज्यादा मिट्टी नदी को गंदला और बीमार कर रही है। धौरासांड से लेकर लावाकेरा तक ईब नदी का पानी लगातार खराब हो रहा है। हालात यह हैं कि लावाकेरा गांव के लोगों का कहना है कि अब नदी में मछली मिलना मुश्किल हो गया है, निस्तार के लिए पानी उपयोग लायक नहीं रहा और पशुओं को भी साफ पानी नसीब नहीं हो पा रहा। मीडिया को देख भागे, सवालों से बचते दिखे खननकर्ता जब इस अवैध गतिविधि की पड़ताल के लिए टीम मौके पर पहुंची, तो उससे पहले ही सोनाजोरी नाला में भी पांच अवैध सोना खदानें संचालित होती मिलीं। एक स्थान सीनाजोरी पुल के पास भोकलू राम की जमीन से जेसीबी द्वारा खोदी गई मिट्टी नदी किनारे डाली जा रही थी, जिसे बाद में उसका परिवार नदी में बहाकर स्वर्ण कण चुनता है।जिसका कहना है कि बंजर जमीन को खेती लायक बनाने के लिए जमीन की मिट्टी नदी में डालकर सोना मिल रहा है जिससे जेसीबी,ट्रैक्टर का खर्चा निकल जाएगा।इसमें गलत क्या है? मैं नहीं जानता। हालांकि, धौरासांड ईब नदी के किनारे जैसे ही मीडिया मौके पर पहुंची, अधिकांश लोग मौके से भाग खड़े हुए। मोटर पंप बंद कर दिए गए और काम रोक दिया गया। दो मजदूरों को रोककर बातचीत शुरू की गई, तब उनके बुलाने पर 5 से 10 लोग सामने आए। यह व्यवहार खुद ही इस बात की ओर इशारा करता है कि सब कुछ “परंपरा” के नाम पर इतना सरल नहीं है। आजीविका का तर्क, लेकिन नुकसान नदी का खनन में लगे लोगों का कहना है कि गांव में रोजगार का कोई साधन नहीं है। उन्होंने बताया कि पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह द्वारा धौरासांड से दाईजबहार तक ईब नदी पर पुल निर्माण की घोषणा की गई थी, लेकिन आज तक काम शुरू नहीं हुआ। मजदूरी नहीं मिलने और सोना निकालने की पुरानी परंपरा का हवाला देकर वे इसे अपनी आजीविका का एकमात्र साधन बता रहे हैं। यह तर्क अपनी जगह है, लेकिन सवाल यह है कि क्या रोजगार के नाम पर पूरी नदी को बर्बाद कर देना जायज़ है? सरपंच अनजान, पंचायत से नहीं ली गई अनुमति मामले में धौरासांड की सरपंच दशमती पैंकरा से बात करने पर चौंकाने वाला तथ्य सामने आया। सरपंच ने कहा कि उन्हें पंचायत क्षेत्र में वर्षों से चल रही सोने की खदानों की कोई जानकारी नहीं है। न तो पंचायत से किसी प्रकार की अनुमति ली गई है और न ही कोई टैक्स जमा किया गया है। सरपंच ने साफ कहा कि नदी में मिट्टी बहाना गलत है। वहीं, एसडीएम ओंकारेश्वर सिंह ने कहा कि वे मौका मुआयना के बाद ही इस पर कोई ठोस टिप्पणी कर पाएंगे। पर्यावरण नियम क्या कहते हैं? पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) की Sustainable Sand Mining Management Guidelines 2016 भले ही रेत और लघु खनिजों के लिए हों, लेकिन इनके मूल सिद्धांत साफ हैं— नदी के प्राकृतिक बहाव और पारिस्थितिकी तंत्र से छेड़छाड़ नहीं होनी चाहिए नदी तटों को काटकर या मिट्टी बहाकर खनन करना पर्यावरणीय अपराध है बिना अनुमति, बिना आकलन और बिना पुनर्स्थापन योजना के कोई भी खनन अवैध माना जाता है नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) भी कई मामलों में स्पष्ट कर चुका है कि नदी के सक्रिय प्रवाह क्षेत्र में खनन पर्यावरण कानूनों का उल्लंघन है। नतीजा क्या होगा? एक तरफ स्वर्ण माफिया ग्रामीणों को सरकार के खिलाफ भड़काने की कोशिश कर रहे हैं, तो दूसरी ओर ग्रामीण इसे अपनी मजबूरी और परंपरा बताकर जारी रखने की बात कह रहे हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि अगर यही हाल रहा तो ईब नदी का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा। अब सवाल साफ है— क्या प्रशासन समय रहते कार्रवाई कर ईब नदी को बचाएगा, या फिर सोने की कुछ चमकदार रेत के लिए जशपुर अपनी जीवनदायिनी नदी खो देगा?

अधिकार से परिणाम की ओर: मनरेगा को VBGRAM-G से बदलने का तर्क

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(अधिकार से परिणाम की ओर: मनरेगा को VBGRAM-G से बदलने का तर्क)   नीरवा मेहता के विचार   सार्वजनिक नीतियों का मूल्यांकन भावना, पुरानी यादों या राजनीतिक प्रतीकों के आधार पर नहीं, बल्कि उनके वास्तविक परिणामों के आधार पर किया जाना चाहिए। मनरेगा को विकसित भारत गारंटी फॉर रोज़गार एंड आजीविका मिशन ग्रामीण अधिनियम, 2025 (VB GRAM G) से बदलने के निर्णय पर स्वाभाविक रूप से विरोध हुआ है। आलोचकों का कहना है कि यह नया कानून अधिकारों को कमजोर करता है, राज्यों पर बोझ डालता है, केंद्र के हाथों में सत्ता का केंद्रीकरण करता है और महात्मा गांधी की विरासत को मिटा देता है। लेकिन ये आपत्तियाँ नीति के वास्तविक स्वरूप से अधिक राजनीतिक मानसिकता को दर्शाती हैं।   VB GRAM G पर सबसे बड़ा आरोप यह है कि यह अधिकार आधारित ढाँचे को तोड़ देता है। यह तर्क इस गलत मान्यता पर आधारित है कि कानूनी अधिकार अपने आप सशक्तिकरण में बदल जाता है। मनरेगा के लगभग दो दशकों के अनुभव ने इस सोच की सीमाओं को उजागर कर दिया है। मजदूरी में लगातार देरी, काम की अधूरी मांग, खराब गुणवत्ता की परिसंपत्तियाँ और असमान क्रियान्वयन ने धीरे-धीरे उस अधिकार को खोखला कर दिया, जिसे न्यायसंगत माना गया था। जो अधिकार समय पर, व्यापक स्तर पर और निरंतर रूप से लागू ही न हो सके, वह व्यवहार में अधिकार नहीं रह जाता। VB GRAM G राज्य की रोज़गार उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी खत्म नहीं करता, बल्कि उसे नए तरीके से संरचित करता है—समयसीमा तय करके, परिणामों से वित्त पोषण जोड़कर और जवाबदेही को संस्थागत रूप देकर। यह अधिकारों का कमजोर होना नहीं, बल्कि उनकी व्यावहारिक सुधार प्रक्रिया है।   इससे भी अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि यह नया कानून भारत की विकास सोच में एक आवश्यक बदलाव को दर्शाता है। मनरेगा को तीव्र ग्रामीण संकट के दौर में एक राहत योजना के रूप में तैयार किया गया था। लेकिन यदि संकट आधारित रोज़गार को स्थायी नीति बना दिया जाए, तो यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था में ठहराव को सामान्य बना देता है। VB GRAM G अल्पकालिक रोज़गार को आजीविका निर्माण, कौशल विकास और उत्पादक परिसंपत्तियों से जोड़ता है। केवल काम के दिनों की गिनती से हटकर स्थायी आय और आजीविका पर जोर देना इस सच्चाई को स्वीकार करता है कि गरिमा केवल काम मिलने से नहीं, बल्कि आय की स्थिरता, उत्पादकता और सामाजिक उन्नति से आती है। जो कल्याणकारी व्यवस्था खुद को समय के साथ नहीं बदलती, वह गरीबी खत्म करने के बजाय निर्भरता को बढ़ावा देती है।   राज्यों पर बढ़ते वित्तीय बोझ की चिंता भी गहराई से देखने पर टिकती नहीं। पुराने ढाँचे में राज्यों को केंद्रीय फंड में देरी, अनियोजित देनदारियों और लागत साझा करने के विवादों का सामना करना पड़ता था। VB GRAM G स्पष्ट वित्तीय भूमिकाएँ, मध्यम अवधि की योजना और परिणाम आधारित वित्तपोषण लाता है। वास्तविक वित्तीय संघवाद की नींव ही पूर्वानुमेयता है। इससे राज्यों को संकट प्रबंधन के बजाय योजनाबद्ध ढंग से काम करने का अवसर मिलता है, जिससे उनकी प्रशासनिक स्वायत्तता मजबूत होती है।   इसी तरह, अत्यधिक केंद्रीकरण का आरोप राष्ट्रीय मानकों और सूक्ष्म प्रबंधन के बीच के अंतर को समझने में चूक करता है। इतने बड़े पैमाने की योजना में पारदर्शिता, पात्रता और निगरानी के लिए एकसमान मानक जरूरी हैं। स्थानीय संस्थाएँ अब भी कार्यों की पहचान करेंगी, परियोजनाएँ लागू करेंगी और क्रियान्वयन की निगरानी करेंगी। फर्क सिर्फ इतना है कि अब प्रदर्शन और जवाबदेही पर जोर दिया गया है। इतिहास बताता है कि बिना निगरानी के विकेंद्रीकरण का लाभ अक्सर श्रमिकों से ज्यादा बिचौलियों को मिला है। VB GRAM G इसी संरचनात्मक दोष को ठीक करने की कोशिश करता है।   सबसे भावनात्मक आलोचना महात्मा गांधी का नाम हटाने को लेकर है। यह तर्क नीति की वास्तविक प्रभावशीलता के बजाय प्रतीकवाद को प्राथमिकता देता है। गांधी की आर्थिक सोच उत्पादक श्रम, आत्मनिर्भरता, विकेंद्रीकृत विकास और नैतिक जिम्मेदारी पर आधारित थी। उनके नाम को बनाए रखते हुए प्रणालीगत अक्षमताओं को स्वीकार करना उनकी विरासत का सम्मान नहीं है। इसके विपरीत, टिकाऊ सामुदायिक परिसंपत्तियों, स्थानीय उद्यम और आजीविका की स्थिरता पर आधारित कार्यक्रम गांधीवादी सिद्धांतों के कहीं अधिक अनुरूप है, बजाय इसके कि केवल जीविका-भर काम को अंतिम लक्ष्य मान लिया जाए।   हर सुधार का विरोध होता है, खासकर जब वह जमी-जमाई राजनीतिक धारणाओं को चुनौती देता है। लेकिन सामाजिक नीति को समय में जकड़कर नहीं रखा जा सकता। भारत की जनसंख्या संबंधी दबाव, वित्तीय सीमाएँ और विकास की आकांक्षाएँ ऐसे साधनों की मांग करती हैं जो मापनीय और ठोस परिणाम दें। VB GRAM G ग्रामीण रोज़गार नीति को इनपुट आधारित अधिकार से हटाकर परिणाम आधारित गारंटी की ओर ले जाने का एक सचेत प्रयास है। इस बदलाव के लिए सतर्कता, निरंतर सुधार और अनुशासित क्रियान्वयन जरूरी होगा। लेकिन सुधार का विरोध करना उससे भी बड़ी विफलता होगी।   असल विकल्प करुणा और दक्षता या अधिकार और सुधार के बीच नहीं है। असली सवाल यह है कि क्या हम ऐसी कल्याणकारी व्यवस्था चाहते हैं जो बदलती वास्तविकताओं के साथ खुद को ढाले, या फिर ऐसी जो पुरानी संरचनाओं से चिपकी रहे, भले ही उनकी सीमाएँ उजागर हो चुकी हों। VB GRAM G सोच के इसी विकास का संकेत है। इसका लक्ष्य सार्वजनिक खर्च को टिकाऊ ग्रामीण समृद्धि में बदलना है। राष्ट्रीय बहस की दिशा राजनीतिक नॉस्टैल्जिया नहीं, बल्कि यही लक्ष्य तय करना चाहिए। लेखक के बारे में: निरवा मेहता एक राजनीतिक विश्लेषक और स्तंभकार हैं, जो सार्वजनिक नीति, शासन और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे विषयों पर लिखती हैं। उनका लेखन सत्ता संरचनाओं, राज्य के व्यवहार और भारत तथा वैश्विक संदर्भ में नीतिगत फैसलों के दीर्घकालिक प्रभावों पर केंद्रित रहता है।