# जशपुर कलेक्टर का युगांतकारी निर्णय: 70 साल बाद पहाड़ी कोरवाओं को मिलेगी उनकी ‘माटी’, छल से कब्जाई 31 एकड़ जमीन वापसी का आदेश
# जशपुर कलेक्टर का युगांतकारी निर्णय: 70 साल बाद पहाड़ी कोरवाओं को मिलेगी उनकी ‘माटी’, छल से कब्जाई 31 एकड़ जमीन वापसी का आदेश AI GENERATED जशपुर . आदिवासियों के जल, जंगल और जमीन के अधिकारों को लेकर जशपुर के कलेक्टर न्यायालय ने एक ऐसा फैसला सुनाया है, जो पूरे प्रदेश के लिए ‘नजीर’ बन गया है। कलेक्टर रोहित व्यास ने एक ऐतिहासिक आदेश जारी करते हुए, वर्ष 1955 में छल-कपट के जरिए कब्जाई गई **पहाड़ी कोरवा** (राष्ट्रपति के दत्तक पुत्र मानी जाने वाली विशेष पिछड़ी जनजाति) की **31.31 एकड़** भूमि के हस्तांतरण को ‘शून्य’ घोषित कर दिया है। यह फैसला इस मायने में क्रांतिकारी है कि इसने दशकों पुराने उस भ्रम को तोड़ दिया है कि ‘आदिवासी से आदिवासी’ के बीच हुए पुराने जमीन सौदों को चुनौती नहीं दी जा सकती। अधिवक्ता सत्यप्रकाश तिवारी अति पिछड़ी जनजाति (पहाड़ी कोरवा) के पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं। कलेक्टर न्यायालय में उनकी पैनी और तथ्यपरक पैरवी के कारण ही 70 साल पुराने इस पेचीदा मामले में न्याय की जीत संभव हो सकी। उन्होंने न्यायालय के समक्ष मजबूती से पक्ष रखा कि किस प्रकार भोली-भाली जनजाति के लोगों को कानूनी दांव-पेच और धर्मांतरित व्यक्तियों द्वारा छल का शिकार बनाकर उनकी पैतृक संपत्ति हड़पी गई थी। ### **क्यों ऐतिहासिक है यह फैसला? (प्रमुख बिंदु)** न्यायालय ने सूक्ष्म कानूनी बारीकियों और दस्तावेजों का अध्ययन कर निम्नलिखित निष्कर्ष निकाले: * **धारा 170(ख) का कवच:** न्यायालय ने स्पष्ट किया कि छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता की धारा 170(ख) का दायरा अत्यंत व्यापक है। इसमें ‘प्रत्येक व्यक्ति’ शब्द शामिल है, जिसका अर्थ है कि यदि खरीदार आदिवासी भी है, लेकिन उसने छल या नियमों का उल्लंघन कर जमीन ली है, तो उसे संरक्षण नहीं मिलेगा। * **1959 के पूर्व के नियमों का उल्लंघन:** कलेक्टर ने पाया कि 1959 की संहिता से पहले भी **मध्य प्रदेश भू-राजस्व संहिता 1954** प्रभावी थी। उस समय भी जमीन हस्तांतरण की सूचना सक्षम अधिकारी को देना अनिवार्य था, जिसका पालन नहीं किया गया। * **अवैध बैनामा:** तत्कालीन कलेक्टर या अधिकृत अधिकारी की अनिवार्य अनुमति के बिना किया गया विक्रय पत्र (रजिस्ट्री) कानूनी रूप से ‘अकृत एवं शून्य’ है। * **कब्जा बनाम कागज:** न्यायालय ने स्वीकार किया कि भले ही कागजों में नाम हेरफेर से बदला गया, लेकिन जमीन पर आज भी भौतिक कब्जा पीड़ित पहाड़ी कोरवाओं का ही है। ### ** भूमि सुरक्षा पर बड़ा फैसला** अधिवक्ता सत्यप्रकाश तिवारी ने फैसले के बाद मीडिया को बताया कि: “यह आदेश उन लोगों के लिए एक सख्त चेतावनी है जो धर्मांतरण की आड़ में या आदिवासी पहचान का लाभ उठाकर विशेष पिछड़ी जनजातियों की जमीनों को कपटपूर्ण तरीके से हड़प रहे हैं। जशपुर कलेक्टर का यह फैसला उन हजारों आदिवासियों के लिए उम्मीद की किरण है जिनकी जमीनें दशकों पहले नियमों को ताक पर रखकर छीनी गई थीं।” ### **अंतिम आदेश: राजस्व रिकॉर्ड में सुधार के निर्देश** कलेक्टर जशपुर ने अनुविभागीय अधिकारी (SDO) के पूर्व आदेश को निरस्त कर दिया है। उन्होंने राजस्व विभाग को सख्त निर्देश दिए हैं कि ग्राम करदनापाठ की विवादित 31.31 एकड़ भूमि को तत्काल मूल भू-स्वामी के विधिक वारिसों (भन्जू एवं अन्य) के नाम पर दर्ज (Mutation) कर रिकॉर्ड अपडेट किया जाए। छत्तीसगढ़ के इतिहास में यह फैसला विशेष पिछड़ी जनजातियों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा हेतु एक मील का पत्थर साबित होगा। यह जीत केवल भन्जू और उनके परिवार की नहीं, बल्कि उन सभी आदिम जनजातियों की है जो अपनी जमीन और पहचान बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।