सुशासन सप्ताह के अंतिम दिन जोकारी में विकासखंड स्तरीय शिविर, 17 आवेदनों में 5 का मौके पर निराकरण

VID 20260227 WA0011

सुशासन सप्ताह के अंतिम दिन जोकारी में विकासखंड स्तरीय शिविर, 17 आवेदनों में 5 का मौके पर निराकरण कुनकुरी – सुशासन सप्ताह के अंतिम दिन कुनकुरी विकासखंड के ग्राम जोकारी में विकासखंड स्तरीय शिविर का आयोजन किया गया। शिविर की शुरुआत छत्तीसगढ़ महतारी की पूजा-अर्चना के साथ हुई। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में जनपद पंचायत अध्यक्षा श्रीमती सुशीला साय उपस्थित रहीं। शिविर में कुल 17 आवेदन प्राप्त हुए, जिनमें से 5 आवेदनों का मौके पर ही निराकरण कर दिया गया, जबकि शेष 12 आवेदनों को संबंधित विभागों को अग्रेषित कर शीघ्र समाधान की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। प्राप्त आवेदनों में फौती-नामांतरण, आधार कार्ड केवाईसी, आयुष्मान कार्ड केवाईसी तथा महतारी वंदन योजना से जुड़े प्रकरण शामिल रहे। मुख्य अतिथि श्रीमती सुशीला साय ने कहा कि शिविर में एक भी शिकायत प्राप्त नहीं होना और 17 आवेदनों का आना इस बात का संकेत है कि क्षेत्र में सुशासन प्रभावी ढंग से लागू है। उन्होंने कहा कि सरकार की योजनाओं का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंच रहा है। उन्होंने यह भी प्रसन्नता जताई कि अब महिलाएं व्यवसाय के क्षेत्र में आगे आ रही हैं। कुनकुरी क्षेत्र में मत्स्य पालन में महिलाओं की भागीदारी बढ़ने से आर्थिक विकास को गति मिली है। उन्होंने इसे मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की विकासवादी सोच का परिणाम बताया। जनपद पंचायत सीईओ प्रमोद सिंह ने बताया कि सुशासन सप्ताह के तहत कुनकुरी विकासखंड की चार ग्राम पंचायतों में ब्लॉक स्तर के शिविर आयोजित किए गए। शासन की मंशानुसार क्षेत्र में विभिन्न योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन किया जा रहा है और आमजन की समस्याओं के त्वरित निराकरण पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। शिविर में जनपद पंचायत सीईओ प्रमोद सिंह, बीईओ सुदर्शन पैंकरा, एसडीओ पीएचई विनोद मिश्रा, जोकारी पंचायत की सरपंच मंजू भगत सहित अन्य जनप्रतिनिधि एवं भाजपा पदाधिकारी उपस्थित रहे। कार्यक्रम के सफल आयोजन को लेकर ग्रामीणों में संतोष का वातावरण देखा गया।

PART 1 : “VIP” ईंट के आका कौन ? अवैध बंगला भट्ठों पर मेहरबानी या मिलीभगत! बंद हुए तो जनता को होगी परेशानी, जिम्मेदार अधिकारियों का चौंकाने वाला तर्क

IMG 20260224 WA0007

जशपुर/फरसाबहार – जिले में लाल ईंट के कथित अवैध कारोबार को लेकर अब एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है आखिर “VIP” ईंट के पीछे असली आका कौन हैं? वर्षों से बंगला ईंट भट्ठों का संचालन खुलेआम जारी है, लेकिन कार्रवाई के नाम पर केवल औपचारिकताएं निभाई जा रही हैं। इस पूरे मामले में सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि जिम्मेदार अधिकारियों द्वारा ही इन भट्ठों के संचालन को लेकर ऐसा तर्क दिया जा रहा है, जिसने प्रशासनिक भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। दरअसल,फरसाबहार राजस्व अनुविभाग में स्थानीय स्तर पर “VIP” ब्रांड की मुहर लगाकर लाल ईंटों की बिक्री धड़ल्ले से किए जाने की जानकारी सामने आई है। सरपंच – सचिव से मिली जानकारी के अनुसार बलुआबहार, पम्पशाला, कंदईबहार इलाके में बिना पंचायत एवं ग्राम सभा की अनुमति के ही व्यावसायिक स्तर पर बंगला ईंट भट्ठों का संचालन किया जा रहा है। नियमों के मुताबिक इस प्रकार के किसी भी भट्ठे के संचालन के लिए स्थानीय निकायों से वैधानिक अनुमति अनिवार्य होती है, किंतु संबंधित पंचायतों के पास ऐसे किसी भी संचालन से जुड़े दस्तावेज उपलब्ध नहीं बताए जा रहे हैं। ग्राम पंचायत स्तर पर पदस्थ जनप्रतिनिधियों एवं कर्मचारियों का कहना है कि उनके अभिलेखों में संचालित बंगला ईंट भट्ठों के संबंध में कोई भी वैध स्वीकृति दर्ज नहीं है। इसके बावजूद बीते कई वर्षों से इनका संचालन जारी है, जिससे यह आशंका हो रही है कि कारोबार पूरी तरह से नियमों की अनदेखी कर संचालित किया जा रहा है। मामले को लेकर एक और गंभीर पहलू सामने आया है। सूत्रों के अनुसार, जब संबंधित विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों से इन भट्ठों के विरुद्ध कार्रवाई को लेकर चर्चा की जाती है, तो यह तर्क दिया जाता है कि यदि बंगला ईंट भट्ठों को बंद करा दिया गया, तो आम जनता को निर्माण कार्यों में भारी समस्या का सामना करना पड़ेगा। इतना ही नहीं, यह भी कहा जाता है कि ऐसे में चिमनी ईंट निर्माताओं द्वारा ईंटों के दामों में भारी वृद्धि कर दी जाएगी, जिससे बाजार में ईंटों की कीमतें आसमान छूने लगेंगी। अधिकारियों का यह तर्क अब कई सवालों को जन्म दे रहा है । यदि कोई गतिविधि अवैध है, तो उसे केवल इस आधार पर जारी रहने देना कि उससे बाजार संतुलित बना हुआ है, क्या नियमानुसार उचित है? क्या अवैध संचालन को अप्रत्यक्ष रूप से संरक्षण दिया जा रहा है? ऐसे कई प्रश्न अब स्थानीय नागरिकों के बीच चर्चा का विषय बनते जा रहे हैं। जानकारों का यह भी कहना है कि क्षेत्र में कोयले के अवैध भंडारण की गतिविधियां भी संचालित होने की सूचना समय-समय पर सामने आती रही हैं। पर्यावरण से जुड़े लोगों का मानना है कि बिना किसी नियामक नियंत्रण के संचालित हो रहे भट्ठे क्षेत्रीय पर्यावरण के लिए भी खतरा बन सकते हैं, लेकिन दबाव एवं भय के कारण लोग खुलकर अपनी बात रखने से बच रहे हैं। स्थानीय नागरिकों का दावा है कि जांच के नाम पर खनिज विभाग,राजस्व विभाग के अधिकारी प्रतिवर्ष क्षेत्र का दौरा करते हैं, किंतु कार्रवाई सीमित रूप से चालान तक सिमट जाती है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि यदि गतिविधियां अवैध हैं, तो उन्हें केवल आर्थिक दंड लगाकर संचालित रहने देना किस हद तक न्यायसंगत है? वर्तमान स्थिति में यह पूरा मामला प्रशासनिक जवाबदेही की कसौटी बनता जा रहा है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि संबंधित विभाग इन कथित अवैध बंगला ईंट भट्ठों के विरुद्ध कोई ठोस एवं निर्णायक कार्रवाई करते हैं या फिर कार्रवाई के नाम पर औपचारिकता का सिलसिला यूं ही जारी रहेगा। सबसे बड़ा सवाल अब भी कायम है “VIP” ईंट के असली आका आखिर हैं कौन? हमारी पड़ताल जारी है,,

मुख्यमंत्री के क्षेत्र में 10 करोड़ के उद्यानिकी महाविद्यालय में घोटाले की बू? बैलाटोली में बिना PCC सैकड़ों फुटिंग, जंग लगी सरिया का इस्तेमाल

IMG 20260217 WA0011

मुख्यमंत्री के क्षेत्र में 10 करोड़ के उद्यानिकी महाविद्यालय में घोटाले की बू? रेमते में बिना PCC सैकड़ों फुटिंग, जंग लगी सरिया का इस्तेमाल कुनकुरी/रेमते (जशपुर) – विष्णुदेव साय के विधानसभा क्षेत्र में बन रहे करीब 10 करोड़ रुपये की लागत वाले उद्यानिकी महाविद्यालय भवन में भारी अनियमितताओं का सनसनीखेज मामला सामने आया है। कुनकुरी विकासखंड के ग्राम रेमते में निर्माणाधीन इस प्रोजेक्ट को लेकर घटिया निर्माण और भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे हैं। बिना PCC के सैकड़ों फुटिंग, 200 कॉलम पर सवाल सूत्रों और सामने आई तस्वीरों के अनुसार मुख्य कॉलेज भवन में बिना पीसीसी (Plain Cement Concrete) किए ही सैकड़ों फुटिंग डाल दी गईं। बताया जा रहा है कि करीब 200 कॉलम इसी तरह खड़े कर दिए गए हैं। निर्माण मानकों के अनुसार जहां क्रैंक और मजबूत बेस अनिवार्य होता है, वहां सीधे-सीधे नियमों की अनदेखी की गई है। निर्माणाधीन ढांचे में अभी से कई जगह दरारें दिखाई देने लगी हैं, जो भविष्य में बड़े हादसे का संकेत मानी जा रही हैं। जंग लगी सरिया और कबाड़ सामग्री का इस्तेमाल? आरोप है कि निर्माण में पुरानी और जंग लगी सरिया का इस्तेमाल किया जा रहा है। यदि यह सही है तो यह न केवल गुणवत्ता से समझौता है, बल्कि करोड़ों रुपये के सरकारी धन के दुरुपयोग का मामला भी बनता है। मुंशी पर मनमानी और पैसों की हेराफेरी के आरोप स्थानीय सूत्रों के मुताबिक ठेकेदार के मैनेजर/इंजीनियर राजेंद्र प्रसाद द्वारा साइट पर मनमानी की जा रही है। पहले यह काम पेटी कांट्रेक्टर आकाश के माध्यम से कराया जा रहा था, लेकिन बाद में बाहरी मजदूर लगाकर निम्नस्तरीय कार्य शुरू कर दिया गया। यह भी आरोप है कि परिवार में शादी का हवाला देकर साइट से ही 10 लाख रुपये निकालने की बात मजदूरों के बीच कही गई। साथ ही मजदूरों से गाली-गलौज और अभद्र व्यवहार की शिकायतें भी सामने आई हैं। गुणवत्ता बनाम कमीशन का खेल? पेटी कांट्रेक्टर का दावा है कि वह मानकों के अनुरूप काम कर रहा था, लेकिन कथित रूप से कमीशनखोरी और जल्दबाजी में घटिया निर्माण कराया जा रहा है। यदि समय रहते तकनीकी जांच नहीं हुई तो यह इमारत भविष्य में बड़ी दुर्घटना का कारण बन सकती है। मुख्यमंत्री के क्षेत्र में उठे बड़े सवाल यह उद्यानिकी परियोजना स्वयं मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के कुनकुरी विधानसभा क्षेत्र में स्वीकृत है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या प्रशासन और संबंधित विभाग इस गंभीर मामले पर संज्ञान लेंगे? सबसे चौंकाने वाली बात यह बताई जा रही है कि इस निर्माण कार्य में कथित रूप से घटिया काम कराने वाले मैनेजर/इंजीनियर राजेंद्र को कुछ स्थानीय भाजपा नेताओं का संरक्षण भी प्राप्त है। हालांकि फिलहाल इस बात की आधिकारिक पुष्टि नहीं हो पाई है कि किन नेताओं का नाम इसमें जुड़ा है, लेकिन यदि संरक्षण के आरोप सही साबित होते हैं तो यह मामला और भी गंभीर हो जाएगा। अब बड़ा सवाल यह है कि क्या 10 करोड़ की यह इमारत गुणवत्ता के साथ तैयार होगी या फिर भ्रष्टाचार के दीमक के कारण धराशायी होने का इंतजार करेगी? स्थानीय लोगों ने उच्चस्तरीय तकनीकी जांच और दोषियों पर कड़ी कार्रवाई की मांग की है।

ईब नदी पर चल रहे सोना खदानों से नदी का पानी हुआ लाल,परम्परा का हवाला देकर नदी का जीवन खतरे में डाल रहा मानव समूह,सरकार को इसका पता नहीं!

IMG 20260210 WA0032

मेरे देश की धरती सोना उगले,उगले हीरे मोती,,,हमारे जशपुर जिले में फरसाबहार तहसील क्षेत्र की धरती सोना उगल रही है।जिसकी स्पीड बढ़ाने के लिए स्वर्ण माफिया सक्रिय हो गए हैं।बीते तीन दिनों की हमारी पड़ताल में मानव समूह ईब नदी के लिए खतरा बन चुके हैं हालांकि इस अवैध कारोबार के पीछे के चेहरे तक पहुंचने की हमारी कोशिश नाकाम रही है। जशपुर (फरसाबहार) जशपुर जिले में अवैध रेत खदानों की खबरें आम हैं, लेकिन अब जिले की जीवनदायिनी ईब नदी अवैध सोना खनन की भेंट चढ़ती नजर आ रही है। फरसाबहार तहसील के धौरासांड गांव से होकर बहने वाली ईब नदी पम्पशाला, कोताईबीरा कपाट द्वार और लावाकेरा होते हुए ओडिशा राज्य में प्रवेश करती है। इसी पूरे क्षेत्र में नदी के तटों और आसपास की सरकारी व निजी जमीनों को जेसीबी और ट्रैक्टरों से खोदकर, मिट्टी के ढेर बनाए जा रहे हैं और ओपन टनल सिस्टम के जरिए मिट्टी को सीधे नदी में बहाया जा रहा है। इस प्रक्रिया में सोने के कण बेहद नाममात्र निकल रहे हैं, लेकिन उसके बदले लाखों गुना ज्यादा मिट्टी नदी को गंदला और बीमार कर रही है। धौरासांड से लेकर लावाकेरा तक ईब नदी का पानी लगातार खराब हो रहा है। हालात यह हैं कि लावाकेरा गांव के लोगों का कहना है कि अब नदी में मछली मिलना मुश्किल हो गया है, निस्तार के लिए पानी उपयोग लायक नहीं रहा और पशुओं को भी साफ पानी नसीब नहीं हो पा रहा। मीडिया को देख भागे, सवालों से बचते दिखे खननकर्ता जब इस अवैध गतिविधि की पड़ताल के लिए टीम मौके पर पहुंची, तो उससे पहले ही सोनाजोरी नाला में भी पांच अवैध सोना खदानें संचालित होती मिलीं। एक स्थान सीनाजोरी पुल के पास भोकलू राम की जमीन से जेसीबी द्वारा खोदी गई मिट्टी नदी किनारे डाली जा रही थी, जिसे बाद में उसका परिवार नदी में बहाकर स्वर्ण कण चुनता है।जिसका कहना है कि बंजर जमीन को खेती लायक बनाने के लिए जमीन की मिट्टी नदी में डालकर सोना मिल रहा है जिससे जेसीबी,ट्रैक्टर का खर्चा निकल जाएगा।इसमें गलत क्या है? मैं नहीं जानता। हालांकि, धौरासांड ईब नदी के किनारे जैसे ही मीडिया मौके पर पहुंची, अधिकांश लोग मौके से भाग खड़े हुए। मोटर पंप बंद कर दिए गए और काम रोक दिया गया। दो मजदूरों को रोककर बातचीत शुरू की गई, तब उनके बुलाने पर 5 से 10 लोग सामने आए। यह व्यवहार खुद ही इस बात की ओर इशारा करता है कि सब कुछ “परंपरा” के नाम पर इतना सरल नहीं है। आजीविका का तर्क, लेकिन नुकसान नदी का खनन में लगे लोगों का कहना है कि गांव में रोजगार का कोई साधन नहीं है। उन्होंने बताया कि पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह द्वारा धौरासांड से दाईजबहार तक ईब नदी पर पुल निर्माण की घोषणा की गई थी, लेकिन आज तक काम शुरू नहीं हुआ। मजदूरी नहीं मिलने और सोना निकालने की पुरानी परंपरा का हवाला देकर वे इसे अपनी आजीविका का एकमात्र साधन बता रहे हैं। यह तर्क अपनी जगह है, लेकिन सवाल यह है कि क्या रोजगार के नाम पर पूरी नदी को बर्बाद कर देना जायज़ है? सरपंच अनजान, पंचायत से नहीं ली गई अनुमति मामले में धौरासांड की सरपंच दशमती पैंकरा से बात करने पर चौंकाने वाला तथ्य सामने आया। सरपंच ने कहा कि उन्हें पंचायत क्षेत्र में वर्षों से चल रही सोने की खदानों की कोई जानकारी नहीं है। न तो पंचायत से किसी प्रकार की अनुमति ली गई है और न ही कोई टैक्स जमा किया गया है। सरपंच ने साफ कहा कि नदी में मिट्टी बहाना गलत है। वहीं, एसडीएम ओंकारेश्वर सिंह ने कहा कि वे मौका मुआयना के बाद ही इस पर कोई ठोस टिप्पणी कर पाएंगे। पर्यावरण नियम क्या कहते हैं? पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) की Sustainable Sand Mining Management Guidelines 2016 भले ही रेत और लघु खनिजों के लिए हों, लेकिन इनके मूल सिद्धांत साफ हैं— नदी के प्राकृतिक बहाव और पारिस्थितिकी तंत्र से छेड़छाड़ नहीं होनी चाहिए नदी तटों को काटकर या मिट्टी बहाकर खनन करना पर्यावरणीय अपराध है बिना अनुमति, बिना आकलन और बिना पुनर्स्थापन योजना के कोई भी खनन अवैध माना जाता है नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) भी कई मामलों में स्पष्ट कर चुका है कि नदी के सक्रिय प्रवाह क्षेत्र में खनन पर्यावरण कानूनों का उल्लंघन है। नतीजा क्या होगा? एक तरफ स्वर्ण माफिया ग्रामीणों को सरकार के खिलाफ भड़काने की कोशिश कर रहे हैं, तो दूसरी ओर ग्रामीण इसे अपनी मजबूरी और परंपरा बताकर जारी रखने की बात कह रहे हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि अगर यही हाल रहा तो ईब नदी का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा। अब सवाल साफ है— क्या प्रशासन समय रहते कार्रवाई कर ईब नदी को बचाएगा, या फिर सोने की कुछ चमकदार रेत के लिए जशपुर अपनी जीवनदायिनी नदी खो देगा?

*जशपुर में तानाशाह अफसरशाही एवं भ्रष्टाचार को लेकर सड़क पर उतरे हजारों ग्रामीण, तहसीलदार हटाओ, सन्ना बचाओ के लगे नारे। खुड़िया क्षेत्र में सांकेतिक धरना प्रदर्शन एवं जनसंवाद कार्यक्रम हुआ सम्पन्न,नेताओं के साथ आम जनमानस ने सरकार को बदनाम करने का अफसरों पर लगाए कई गम्भीर आरोप* देखिए पूरी खबर

IMG 20260207 WA0006

*जशपुर में तानाशाह अफसरशाही एवं भ्रष्टाचार को लेकर सड़क पर उतरे हजारों ग्रामीण, तहसीलदार हटाओ, सन्ना बचाओ के लगे नारे। खुड़िया क्षेत्र में सांकेतिक धरना प्रदर्शन एवं जनसंवाद कार्यक्रम हुआ सम्पन्न,नेताओं के साथ आम जनमानस ने सरकार को बदनाम करने का अफसरों पर लगाए कई गम्भीर आरोप* जशपुर/सन्ना – जशपुर जिले के खुड़िया क्षेत्र कहे जाने वाला सन्ना तहसील क्षेत्र के नन्हेसर ग्राम में बीते दिन बगीचा जनपद सदस्य राकेश गुप्ता के द्वारा एक दिवसीय सांकेतिक धरना प्रदर्शन एवं जनसंवाद का कार्यक्रम आयोजित किया गया था जिसमें खुड़िया क्षेत्र में रहने वाले गांव गांव के प्रमुखों को बुलाया गया था जिसमें हजारों की संख्या में आम जनमानस का जनसैलाब उमड़ पड़ा। जहां क्षेत्रवासियों ने पहले नन्हेसर ग्राम में रैली निकाल कर तहसीलदार रौशनी तिर्की हटाओ – सन्ना बचाओ का नारा लगाने के साथ साथ जल जीवन मिशन योजना के नलों में शुद्ध पानी मांगने, किसानों के साथ अन्याय करना बंद करो जैसे नारा लगाया।जिसके बाद रैली सभा स्थल में पहुंची और फिर जनसंवाद का कार्यक्रम प्रारंभ हुआ जिस जनसंवाद में खुड़िया क्षेत्र के प्रमुखों के अलावा बगीचा से कोरवा समाज की नेत्री शोभापति दीवान,चंद्रदेव ग्वाला,सुखलाल यादव ने सभा को संबोधित किया। जनसंवाद कार्यक्रम में बारी बारी क्षेत्र के दर्जनों ग्राम प्रमुखों ने उठ उठ कर क्षेत्र की समस्याओं को बताया।जिसमें सबसे एक स्वर में बताया कि खुड़िया क्षेत्र के बहुत से गांव में जल जीवन मिशन के तहत लगाया गया घर घर नल जल योजना में एक दिन भी पानी नहीं मिला है जिसे यहां के अधिकारी गलत रिपोर्टिंग करके सरकार को गुमराह कर रहे हैं।दूसरा मामला सन्ना तहसील में पदस्त तहसीलदार रौशनी तिर्की को लेकर भी दर्जनों ग्राम प्रमुखों ने तहसीलदार पर रिश्वतखोरी के अलावा कई गम्भीर गंभीर आरोप लगाए और सन्ना तहसीलदार को सन्ना से हटाए जाने की मांग करने लगे।वहीं इस जनसंवाद कार्यक्रम में कई किसानों का धान भी रकबा के हिसाब से नहीं खरीदने का गम्भीर आरोप लगाया और बचे हुए किसानों का धान पुनः खरीदी करने का मांग किया गया।वहीं सामाजिक सुरक्षा पेंशन,विधवा,वृद्धा,विकलांग पेंशन में भी हो रहे अनियमितता को भी कई बुजुर्गों ने बताया। जनसंवाद कार्यक्रम के अंतिम में क्षेत्र के जनपद सदस्य राकेश गुप्ता ने बताया कि यह कार्यक्रम जशपुर जिले में पदस्थ झूठे और तानाशाह अफसरशाही को लेकर एक सांकेतिक प्रदर्शन था । सरकार की अच्छी – अच्छी योजनाओं को जिले के अधिकारी मिट्टी में मिलाकर सरकार को गुमराह करने का प्रयास करते हैं और झूठी रिपोर्ट भेजते हैं इसी कारण यह जनसंवाद कर सरकार तक सच्चाई पहुंचाने का यह पहल है।मेरे अलावा क्षेत्र में आए दिन कई ग्रामीणों को सन्ना तहसीलदार रौशनी तिर्की के द्वारा परेशान करने शिकायत मिलता रहता है परंतु कार्यवाही नहीं होने से माहौल इस ओर परिवर्तित हो रहा है। *जमकर दहाड़ी कोरवा समाज की नेत्री शोभापति दीवान* उपरोक्त कार्यक्रम में सहयोग देने बगीचा से पहुंची कोरवा समाज की नेत्री शोभापति दीवान ने भी प्रशासन के खिलाफ जमकर बोली उन्होंने कहा कि एक दुष्ट तहसीलदार अधिकारी रौशनी तिर्की पूरे क्षेत्र को तबाह करके रखी है जिसका आए दिन शिकायत मिलता है परंतु इसे ऐसा कौन है जो संरक्षण दे रहा है और इसे सन्ना खुड़िया क्षेत्र को लूटने के लिए बैठाया है अब इस क्षेत्र की नारी शक्ति को जाएंगे कि आवश्यकता है और तहसीलदार को भगाने की आवश्यकता है। *जनजाति सुरक्षा मंच के सैकड़ों कार्यकर्ता दिखे सभा में* जनजाति सुरक्षा मंच के चंद्रदेव ग्वाला और सुखलाल यादव ने भी क्षेत्र में चल रहे काले कारनामों को सभा को संबोधित करते हुए बताया और जनता को आगे बढ़ने का बात कहा।कार्यक्रम में सैकड़ों की संख्या में जनजाति सुरक्षा मंच के प्रमुख कार्यकर्ता दिखे जिसमें उल्लेश्वर भगत,हेमनाथ भगत जिससे तेज तर्रार युवा कार्यकर्ताओं का ग्रुप शामिल था। कोरवा समाज के प्रमुख नन्हेसर के अमृत कोरवा ने भी गांव में शुद्ध पानी नहीं मिलने का बात को कहा और तहसीलदार को जल्दी हटाने का मांग किया। कार्यक्रम के अंतिम में सभी ने महामहिम राष्ट्रपति महोदया के नाम नायब तहसीलदार तोष कुरमा सिंह को ज्ञापन सौंप कार्यवाही की मांग किया।

अधिकार से परिणाम की ओर: मनरेगा को VBGRAM-G से बदलने का तर्क

FB IMG 1770387157636

(अधिकार से परिणाम की ओर: मनरेगा को VBGRAM-G से बदलने का तर्क)   नीरवा मेहता के विचार   सार्वजनिक नीतियों का मूल्यांकन भावना, पुरानी यादों या राजनीतिक प्रतीकों के आधार पर नहीं, बल्कि उनके वास्तविक परिणामों के आधार पर किया जाना चाहिए। मनरेगा को विकसित भारत गारंटी फॉर रोज़गार एंड आजीविका मिशन ग्रामीण अधिनियम, 2025 (VB GRAM G) से बदलने के निर्णय पर स्वाभाविक रूप से विरोध हुआ है। आलोचकों का कहना है कि यह नया कानून अधिकारों को कमजोर करता है, राज्यों पर बोझ डालता है, केंद्र के हाथों में सत्ता का केंद्रीकरण करता है और महात्मा गांधी की विरासत को मिटा देता है। लेकिन ये आपत्तियाँ नीति के वास्तविक स्वरूप से अधिक राजनीतिक मानसिकता को दर्शाती हैं।   VB GRAM G पर सबसे बड़ा आरोप यह है कि यह अधिकार आधारित ढाँचे को तोड़ देता है। यह तर्क इस गलत मान्यता पर आधारित है कि कानूनी अधिकार अपने आप सशक्तिकरण में बदल जाता है। मनरेगा के लगभग दो दशकों के अनुभव ने इस सोच की सीमाओं को उजागर कर दिया है। मजदूरी में लगातार देरी, काम की अधूरी मांग, खराब गुणवत्ता की परिसंपत्तियाँ और असमान क्रियान्वयन ने धीरे-धीरे उस अधिकार को खोखला कर दिया, जिसे न्यायसंगत माना गया था। जो अधिकार समय पर, व्यापक स्तर पर और निरंतर रूप से लागू ही न हो सके, वह व्यवहार में अधिकार नहीं रह जाता। VB GRAM G राज्य की रोज़गार उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी खत्म नहीं करता, बल्कि उसे नए तरीके से संरचित करता है—समयसीमा तय करके, परिणामों से वित्त पोषण जोड़कर और जवाबदेही को संस्थागत रूप देकर। यह अधिकारों का कमजोर होना नहीं, बल्कि उनकी व्यावहारिक सुधार प्रक्रिया है।   इससे भी अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि यह नया कानून भारत की विकास सोच में एक आवश्यक बदलाव को दर्शाता है। मनरेगा को तीव्र ग्रामीण संकट के दौर में एक राहत योजना के रूप में तैयार किया गया था। लेकिन यदि संकट आधारित रोज़गार को स्थायी नीति बना दिया जाए, तो यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था में ठहराव को सामान्य बना देता है। VB GRAM G अल्पकालिक रोज़गार को आजीविका निर्माण, कौशल विकास और उत्पादक परिसंपत्तियों से जोड़ता है। केवल काम के दिनों की गिनती से हटकर स्थायी आय और आजीविका पर जोर देना इस सच्चाई को स्वीकार करता है कि गरिमा केवल काम मिलने से नहीं, बल्कि आय की स्थिरता, उत्पादकता और सामाजिक उन्नति से आती है। जो कल्याणकारी व्यवस्था खुद को समय के साथ नहीं बदलती, वह गरीबी खत्म करने के बजाय निर्भरता को बढ़ावा देती है।   राज्यों पर बढ़ते वित्तीय बोझ की चिंता भी गहराई से देखने पर टिकती नहीं। पुराने ढाँचे में राज्यों को केंद्रीय फंड में देरी, अनियोजित देनदारियों और लागत साझा करने के विवादों का सामना करना पड़ता था। VB GRAM G स्पष्ट वित्तीय भूमिकाएँ, मध्यम अवधि की योजना और परिणाम आधारित वित्तपोषण लाता है। वास्तविक वित्तीय संघवाद की नींव ही पूर्वानुमेयता है। इससे राज्यों को संकट प्रबंधन के बजाय योजनाबद्ध ढंग से काम करने का अवसर मिलता है, जिससे उनकी प्रशासनिक स्वायत्तता मजबूत होती है।   इसी तरह, अत्यधिक केंद्रीकरण का आरोप राष्ट्रीय मानकों और सूक्ष्म प्रबंधन के बीच के अंतर को समझने में चूक करता है। इतने बड़े पैमाने की योजना में पारदर्शिता, पात्रता और निगरानी के लिए एकसमान मानक जरूरी हैं। स्थानीय संस्थाएँ अब भी कार्यों की पहचान करेंगी, परियोजनाएँ लागू करेंगी और क्रियान्वयन की निगरानी करेंगी। फर्क सिर्फ इतना है कि अब प्रदर्शन और जवाबदेही पर जोर दिया गया है। इतिहास बताता है कि बिना निगरानी के विकेंद्रीकरण का लाभ अक्सर श्रमिकों से ज्यादा बिचौलियों को मिला है। VB GRAM G इसी संरचनात्मक दोष को ठीक करने की कोशिश करता है।   सबसे भावनात्मक आलोचना महात्मा गांधी का नाम हटाने को लेकर है। यह तर्क नीति की वास्तविक प्रभावशीलता के बजाय प्रतीकवाद को प्राथमिकता देता है। गांधी की आर्थिक सोच उत्पादक श्रम, आत्मनिर्भरता, विकेंद्रीकृत विकास और नैतिक जिम्मेदारी पर आधारित थी। उनके नाम को बनाए रखते हुए प्रणालीगत अक्षमताओं को स्वीकार करना उनकी विरासत का सम्मान नहीं है। इसके विपरीत, टिकाऊ सामुदायिक परिसंपत्तियों, स्थानीय उद्यम और आजीविका की स्थिरता पर आधारित कार्यक्रम गांधीवादी सिद्धांतों के कहीं अधिक अनुरूप है, बजाय इसके कि केवल जीविका-भर काम को अंतिम लक्ष्य मान लिया जाए।   हर सुधार का विरोध होता है, खासकर जब वह जमी-जमाई राजनीतिक धारणाओं को चुनौती देता है। लेकिन सामाजिक नीति को समय में जकड़कर नहीं रखा जा सकता। भारत की जनसंख्या संबंधी दबाव, वित्तीय सीमाएँ और विकास की आकांक्षाएँ ऐसे साधनों की मांग करती हैं जो मापनीय और ठोस परिणाम दें। VB GRAM G ग्रामीण रोज़गार नीति को इनपुट आधारित अधिकार से हटाकर परिणाम आधारित गारंटी की ओर ले जाने का एक सचेत प्रयास है। इस बदलाव के लिए सतर्कता, निरंतर सुधार और अनुशासित क्रियान्वयन जरूरी होगा। लेकिन सुधार का विरोध करना उससे भी बड़ी विफलता होगी।   असल विकल्प करुणा और दक्षता या अधिकार और सुधार के बीच नहीं है। असली सवाल यह है कि क्या हम ऐसी कल्याणकारी व्यवस्था चाहते हैं जो बदलती वास्तविकताओं के साथ खुद को ढाले, या फिर ऐसी जो पुरानी संरचनाओं से चिपकी रहे, भले ही उनकी सीमाएँ उजागर हो चुकी हों। VB GRAM G सोच के इसी विकास का संकेत है। इसका लक्ष्य सार्वजनिक खर्च को टिकाऊ ग्रामीण समृद्धि में बदलना है। राष्ट्रीय बहस की दिशा राजनीतिक नॉस्टैल्जिया नहीं, बल्कि यही लक्ष्य तय करना चाहिए। लेखक के बारे में: निरवा मेहता एक राजनीतिक विश्लेषक और स्तंभकार हैं, जो सार्वजनिक नीति, शासन और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे विषयों पर लिखती हैं। उनका लेखन सत्ता संरचनाओं, राज्य के व्यवहार और भारत तथा वैश्विक संदर्भ में नीतिगत फैसलों के दीर्घकालिक प्रभावों पर केंद्रित रहता है।

*बड़ी खबर* *धान खरीदी: किसानों के हित में मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय के निर्देश पर अतिरिक्त दो दिवस धान खरीदी की व्यवस्था*

IMG 20251111 WA0002

*धान खरीदी: किसानों के हित में मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय के निर्देश पर अतिरिक्त दो दिवस धान खरीदी की व्यवस्था* रायपुर 3 फरवरी 2026/ मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय के निर्देश पर प्रदेश में किसानों के हितों को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए धान खरीदी की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण राहत प्रदान की गई है। इसके अंतर्गत तीन श्रेणियों के किसानों को धान विक्रय हेतु अतिरिक्त दो दिवस – 05 एवं 06 फरवरी 2026 तक खरीदी की अनुमति प्रदान की गई है। मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय के निर्देशानुसार तीन प्रकार के किसान इस अतिरिक्त अवधि में धान विक्रय कर सकेंगे— ऐसे किसान, जिनके द्वारा 10 जनवरी 2026 के पश्चात टोकन हेतु आवेदन किया गया, किंतु सत्यापन नहीं हो पाया है। ऐसे किसान, जिनके द्वारा 10 जनवरी 2026 के पश्चात आवेदन किया गया तथा सत्यापन उपरांत उनके पास धान पाया गया है। ऐसे किसान, जिन्हें दिनांक 28 जनवरी 2026, 29 जनवरी 2026 एवं 30 जनवरी 2026 को टोकन प्राप्त हुआ था, परंतु किसी कारणवश वे निर्धारित तिथि पर धान विक्रय नहीं कर पाए थे। किसानों को किसी प्रकार की असुविधा न हो, इसके लिए बारदाना एवं हमालों की समुचित व्यवस्था सुनिश्चित करने के भी निर्देश संबंधित अधिकारियों को दिए गए हैं। राज्य सरकार का यह निर्णय किसानों के प्रति संवेदनशीलता और उनकी उपज के सुरक्षित एवं सुचारु विक्रय के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

बड़ी खबर : कंवर समाज को मिला नया राष्ट्रीय नेतृत्व, छत्तीसगढ़ मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की धर्मपत्नी श्रीमती कौशल्या साय बनीं राष्ट्रीय अध्यक्ष

FB IMG 1768407541130

बड़ी खबर : कंवर समाज को मिला नया राष्ट्रीय नेतृत्व, छत्तीसगढ़ मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की धर्मपत्नी श्रीमती कौशल्या साय बनीं राष्ट्रीय अध्यक्ष   जशपुर : अखिल भारतीय आदिवासी कंवर समाज विकास समिति का तीन दिवसीय राष्ट्रीय वार्षिक सम्मेलन केंद्रीय कार्यालय पमशाला, जिला जशपुर में भव्य व गरिमामय वातावरण में संपन्न हो रहा है। सम्मेलन के दूसरे दिन सर्वसम्मति से राष्ट्रीय पदाधिकारियों का चयन किया गया, जिसमें श्रीमती कौशल्या विष्णुदेव साय को राष्ट्रीय अध्यक्ष चुना गया। उल्लेखनीय है कि श्रीमती कौशल्या साय मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की धर्मपत्नी हैं और समाजसेवा के क्षेत्र में उनकी भूमिका लंबे समय से सक्रिय, समर्पित और प्रभावशाली रही है। सम्मेलन में मंगरु साय पैंकरा को राष्ट्रीय महासचिव, अनंत राम पाकरगांव को न्याय समिति अध्यक्ष, श्रीमती शांता साय (लैलूंगा) को राष्ट्रीय महिला प्रकोष्ठ अध्यक्ष तथा हरिशंकर साय (मधुबन) को राष्ट्रीय युवा प्रकोष्ठ अध्यक्ष चुना गया। इस अवसर पर समाज उत्थान, शिक्षा, संगठन विस्तार और जनकल्याण के मुद्दों पर गहन चर्चा हुई। साथ ही समाज और जनसेवा को मजबूत करने के उद्देश्य से “ मिलनसार समाज एवं जनसेवा दौरा कार्यक्रम को आगे बढ़ाने का निर्णय लिया गया, जिसके तहत नवचयनित पदाधिकारी विभिन्न क्षेत्रों में जाकर समाजजनों से सीधा संवाद करेंगे। नवचयनित पदाधिकारियों को पूर्व पदाधिकारियों और समाज के वरिष्ठ सदस्यों ने बधाई देते हुए विश्वास जताया कि श्रीमती कौशल्या साय के नेतृत्व में कंवर समाज को नई दिशा, संगठनात्मक मजबूती और जनसेवा को व्यापक विस्तार मिलेगा।

देखिए धान की “उल्टी गंगा” — राइस मिल से सीधे खरीदी केंद्र पहुंच रहा धान!प्रशासन की बड़ी कार्रवाई

IMG 20260113 WA0028

देखिए धान की “उल्टी गंगा” — राइस मिल से सीधे खरीदी केंद्र पहुंच रहा धान! जशपुर से बड़ी खबर जशपुर जिले में धान खरीदी के बीच एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जिसने पूरी व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। आमतौर पर किसानों का धान खरीदी केंद्र से राइस मिल जाता है, लेकिन जशपुर में मामला बिल्कुल उल्टा निकला — राइस मिल से धान निकालकर सीधे खरीदी केंद्र ले जाने की कोशिश पकड़ी गई है। ताजा मामला कांसाबेल विकासखंड का है। यहां बगिया स्थित वेदांश राइस मिल से अवैध रूप से धान निकालकर उसे चोंगरीबहार धान खरीदी केंद्र ले जाया जा रहा था। प्रशासन को गुप्त सूचना मिली थी, जिसके बाद पुलिस और राजस्व विभाग की संयुक्त टीम ने जाल बिछाकर कार्रवाई की। 🚜 दो ट्रैक्टर पकड़े गए, 100 क्विंटल धान जब्त कार्रवाई के दौरान राइस मिल से निकलकर धान खरीदी केंद्र की ओर जा रहे दो ट्रैक्टरों को रोका गया। ट्रैक्टरों में करीब 100 क्विंटल धान लोड था। ट्रैक्टर चालकों मानेश्वर सिदार और यमन बेहरा ने पूछताछ में स्वीकार किया कि धान राइस मिल से चोंगरीबहार धान खरीदी केंद्र ले जाया जा रहा था। यह कार्रवाई राइस मिल के पास ही, खरीदी केंद्र के रास्ते में की गई। फिलहाल दोनों ट्रैक्टर जब्त कर लिए गए हैं और दस्तावेजों की जांच जारी है। ❓ पुराने धान को नया बताकर खपाने की आशंका प्रशासनिक सूत्रों के मुताबिक आशंका है कि राइस मिल में रखा पुराना धान नए धान के रूप में खरीदी केंद्र में खपाने की कोशिश की जा रही थी। अगर ऐसा साबित होता है, तो यह सीधे-सीधे सरकारी खरीदी प्रणाली से बड़ा खेल माना जाएगा। 🔍 और भी जगहों से मिल रही शिकायतें धान मंडी से जुड़े सूत्रों का कहना है कि सिंगीबहार क्षेत्र की एक राइस मिल से भी आसपास की मंडियों में इसी तरह धान भेजे जाने की चर्चा है।हमारी पड़ताल जारी है। इतना ही नहीं, गड़बड़ी पकड़ने के लिए उपरकछार बेरियर पर लगाए गए सीसीटीवी कैमरे की दिशा भी संदिग्ध बताई जा रही है। कैमरा सड़क की बजाय पुलिस चौकी को कवर कर रहा है। जानकारों का दावा है कि जिला प्रशासन राइस मिलों के सीसीटीवी कैमरे में धान लद रहे विजुअल और धान खरीदी में लगे सीसीटीवी कैमरे से धान उतरते विजुअल की मिलान करे तो बिचौलिए और राइस मिलर बेपर्दा हो जाएंगे। आज दोपहर करीब 2 बजे बेरियर पर कोई भी अधिकारी-कर्मचारी ड्यूटी पर मौजूद नहीं था, जिससे ग्रामीणों के आरोपों को और बल मिलता है। 🏛️ संरक्षण का आरोप, बड़ा खेल होने की चर्चा ग्रामीणों और मंडी सूत्रों का दावा है कि यह खेल छोटे स्तर का नहीं, बल्कि बड़े संरक्षण में चल रहा है। चर्चा है कि किसी प्रभावशाली व्यक्ति का संरक्षण राइस मिलरों को मिल रहा है। ⚠️ प्रशासन सख्त, बड़ी कार्रवाई के संकेत अधिकारियों का कहना है कि धान खरीदी में किसी भी तरह की गड़बड़ी बर्दाश्त नहीं की जाएगी। जांच के बाद राइस मिल संचालक पर कड़ी कार्रवाई की तैयारी है। 👉 जशपुर में धान खरीदी को लेकर उठे ये सवाल अब प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती बन गए हैं। आने वाले दिनों में जांच आगे बढ़ने के साथ और भी बड़े खुलासे होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा रहा।

मुख्यमंत्री विष्णुदेव की कृपा से किसान को मिला पट्टा,फिर भी नहीं बेच पा रहा धान,,,सुशासन पर बड़ा सवाल

IMG 20260113 WA0006

पटवारी–पोर्टल की जुगलबंदी में पिसता किसान: बी-1 खसरा गड़बड़ी से धान अटका, मुख्यमंत्री के गृहजिले में सुशासन पर उठा बड़ा सवाल जशपुर,13/012026 – जिले के कांसाबेल तहसील का एक किसान बी वन में दर्ज आधिकारिक खसरे नम्बर के कारण न तो सरकार को धान बेच पा रहा है, न सोलर पैनल लगवा पा रहा है,न ही अपनी खेती को बढ़ाने के लिए बैंक से लोन ले पा रहा है। दरअसल,तिलंगा गांव का किसान दिलबंधु तिर्की को पिता की मृत्यु के बाद भाइयों के बीच जमीन बंटवारे के बाद पट्टा नहीं मिल रहा था।जिसको लेकर मुख्यमंत्री विष्णु देव साय को अपनी तकलीफ बताई। मुख्यमंत्री कार्यालय बगिया के त्वरित सक्रियता से पटवारी ने किसान का पट्टा बनाकर दे दिया। अब परेशानी तब खड़ी हो गई जब दिलबंधन तिर्की अपनी खेती का धान बेचने के लिए पंजीयन कराने सहकारी समिति गया।जहां देखा गया की पट्टे में दर्ज खसरा नंबर सरकार के भू रिकॉर्ड से बिल्कुल अलग है। दरअसल, वर्ष 2022–23 की बंटवारा सूची में खाता विभाजन पूरी तरह वैधानिक रूप से हुआ था। बंटवारे के आधार पर दर्ज खसरा नंबर हैं— 666/6, 666/9, 666/1 ठ, 666/13, 666/15, 666/20, 672/7, 666/5, 666/8, 666/11, 666/1 ण, 666/17, 666/19, 672/1उ। इन खसरा नंबरों के आधार पर बंटवारा सूची पूरी तरह सही है। यही नहीं, इसी आधार पर ऋण पुस्तिका भी विधिवत जारी की गई, जिसे 23 जून 2025 को पटवारी द्वारा प्रदान किया गया था। लेकिन समस्या तब सामने आई जब किसान ने ऑनलाइन बी-1 रिकॉर्ड निकाला। बी-1 में खसरा नंबर 666/2, 666/12, 666/16, 666/21, 666/5, 666/17 दर्ज मिले, जो न तो बंटवारा सूची से मेल खाते हैं और न ही ऋण पुस्तिका से। इसी तकनीकी विसंगति के कारण सहकारी समिति ने किसान का धान पंजीयन करने से इंकार कर दिया। नतीजतन, किसान का धान आज भी घर में रखा हुआ है। इस संबंध में जब किसान पटवारी के पास गया तो पटवारी ने साफ कह दिया कि खसरा नंबर पट्टे वाले ही पोर्टल पर चढ़ाया लेकिन नहीं लिया।अब खसरा नंबर चेंज नहीं हो सकता।पटवारी की दो टूक बातें सुनकर किसान हताश हो गया और उसका पंजीयन नहीं होने से धान घर में रखा हुआ है।   इस संबंध में जब हमने हल्का पटवारी विक्की गुप्ता से फोन पर बात की तो उन्होंने कहा कि दिलबंधन तिर्की के साथ ही उसके दो भाइयों का भी खसरा नंबर पोर्टल में बदल गया है। ऐसा कइयों का हुआ है।जो खसरा नंबर बी वन में दिख रहा है, वही मान्य है।किसान सीमांकन करा सकता है लेकिन किसान इस बात को समझ नहीं पा रहा है। वहीं पीड़ित किसान ने बताया कि पटवारी के मनमानी से तंग आकर नायब तहसीलदार कांसाबेल के न्यायालय में खसरा नंबर को ठीक करने के लिए आवेदन दिया गया है।जो बी वन में खसरा नंबर है,वह मेरे भाइयों की जमीन है।ऐसे में भविष्य में विवाद पैदा हो सकता है।किसान ने पटवारी पर तहसीलदार के आदेश नहीं मानने और किसान का धान नहीं बिकने पर हुए आर्थिक नुकसान की भरपाई कराने की मांग की है।   बहरहाल,यह बड़ा सवाल है कि ऐसे में विष्णु का सुशासन कैसे सफल होगा कि एक किसान सरकारी सिस्टम के कारण अपना धान नहीं बेच पा रहा है? यह स्थापित लोकल्याणकारी राज्य में शासन की योजनाओं का लाभ हितग्राही को पहुंचा कर देना है न कि उसे दफ्तरों के चक्कर लगवाने हैं। अब देखना है कि मुख्यमंत्री के गृहजिले में ऐसे किसानों को न्याय कब तक मिलेगा या कागजी घोड़े दौड़ते रहेंगे।